रसकपूर
ऐतिहासिक उपन्यास
कांच का दरवाजा
मेरे बचपन का सोनमहल ! जहां बाल- विहंगिनी की तरह मुक्त रूप से विचरती रही। जहां मेरे कदमों ने घुंघुरू छमका कर गीत को जन्म दिया, संगीत की स्वर लहरी पर।
राजतन्त्र का वैभव
आमेर का राजमहल
मुझ सुहागिन की डोली इसी दरवाजे की देहरी पर उतरी थी। मेरे प्रथम स्पन्दन का मूक गीत जो आज भी प्राण के गांव में गूंज रहा है।
जनानी ड्योढ़ी से जुड़ा सौंदर्य का अहम् चन्द्रमहल
इन महलों की राजरानी रियासत पर राज करती थी, आज इसके भीतर कदम रखना भी मुश्किल है। कल यह अपना था और आज सपना है। यहां वह आग जलती है, जिसकी ज्वालाओं में मुझ जैसी..........।
रसकपुर | Rasakpur
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Aacharya Umesh Shashtri
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